रविवार, 17 अप्रैल 2016

032----आज का गीता बोध पाठ

जिज्ञासा मन में  देखी जब,
 अर्जुन पाला उत्तर की चाहत ,
माधव ने शुरू किया बताना ,
देखे अर्जुन पाते राहत ,
152
 मन हैं चंचल,मन हैं कोमल,
 फलेच्छा में जीता है ,
सन्तुष्टि  मिली,फलेच्छा गायब,
 स्थितप्रज्ञ वो हो जाता है,
153
फल से फर्क पडे ना  उसको,
जब जीवन में मिलता है ,
आत्मा इंशा काया में ,
सन्तुष्ट सदा वो रहता है
154------


स्थिर बुद्धि उस मानव में ,
मन में उद्वेग नहीं दुख में,
 राग ,भय, क्रोध, रफूचक्कर ,
सर्वदा निस्पृह रहता सुख में ,
155
अनन्त कामना लेके जीता ,
स्नेह रहित मुशि कल से होता ,
फितरत जीवन की ऐसी है ,
पाने को हरदम रोता
156
स्थिर बुद्धि होती उसकी
शुभ अशुभ में फर्क पडे  नहीं
विषयों से वो दूर रहे,
 आगे इसके तर्क नहीं ,
157
समेटे अपने अंग -2,
सीख उसे कच्छप देता,
 इन्द्रियाँ रहे विषयों से दूर,
 वो वश में कर लेता ,
158
इन्द्रियों से दूरी कुछ में,
 पूर्ण निर्वृत्त ना होती उनमें ,
आसक्ति जीवत रहती ,
प्रवृत्ति नहीं बदलती उनमें ,
159
स्थितप्रज्ञ पुरुष को देखो ,
परम तत्व में आसक्ति है ,
परमपिता से होगा मिलन ,
निर्वृत्त करती आसक्ति है 
160
“मन के के हारे हार है ,
                                     मन के जीते जीत,”  (Taken from outside)
 आसक्ति लीन हैं वो ,
विषयों में में रखता प्रीत
168
 अन्तःकरण भावना शून्य ,
शान्ति कभी ना मिलती ,
सदा लालसा रहती मन में
सुख की घड़ियां कभी ना चलती ,
169,
जल में चलती नाव ,
पतवारों को रोके वेग,
 प्रभाव ऐसा इनिद्रयों का ,
हार लेती ही हैं बुद्धि –वेग
170
स्थिर बुद्धि उसी की है ,
काबिज कभी नहीं होती,
 मन को केन्द्रित करें ,
प्रभु भक्ति में ले जाती ,
171
सुख संसारिक पाने  की होड़ ,
नाशवान समझते जन ,
दिन रात खुशी में बीते,
 यही चाहते जन-मन
172
योगी का ध्यान वहाँ ,
जो परम तत्व का साधन हो ,
सुख है रात्रि समान जिन्है ,
नहीं किसी का बन्धन हो,

173
 नदी का मिलन ,
जब सागर से हो जाता है ,
नदी विलीन होगी उसमें,
 सागर ना विचलित  होता है
174
परमशान्ति आ लिंगन करती,
योग करे ना कोई विकार ,
परमतत्व में विलीन हो तो,
न देती बुद्धि इस को नकार
175

त्याग ,कामना ,तमन्ना रहित ,
ममता ,,अहंकार रहित ,
परम  शान्ति आलिं गन करती ,
रहे सर्वदा विकार रहित
176,
ब्रह्म में स्थित पुरुष वही,
योगी कभी ना मोहित होता ,
ब्रह्म स्थिति सदा सामने ,
ब्रह्मानन्द को प्राप्त होता ,
177
ब्रह्मानन्द है परमानन्द ,
आनन्द की असीम सीमा
जीते मरते जाना जिसने ,
मर्म जीवन का समझा उसने
178
जनसामान्य की समझ पहुँच से दूर ,
मूर्ख बनते हंसी का पात्र ,
थोथी बातों में जीते जीवन,
बनता नियम उनका मात्र
179
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ञृणी कृष्णा के जीवन मरते ,
शब्द बने माध्यम हमसे ,
धरा पे भला हो सबका ,
यही प्रार्थना दिल से  ,
180
कृपा बर से माधव की ,
सब के काम बने सुबह साम,
हंसी खुशी से गुजरे जिन्दगी
सबको मिले प्रेम- शान्ति का मुकाम
181
द्वितीय अध्याय

 गीताबोध

  समाप्त
जय हो कृष्णा


           ----शेष कल

                   निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I

कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II

                                                                (अर्चना  राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते है हैं,उनके लिए जरू
री है कि वे कृष्णा धारा से नुड़ेI
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा I

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