जिज्ञासा मन में देखी जब,
अर्जुन पाला उत्तर की चाहत ,
माधव ने शुरू किया बताना ,
देखे अर्जुन पाते राहत ,
152
मन हैं चंचल,मन हैं कोमल,
फलेच्छा में जीता है ,
सन्तुष्टि मिली,फलेच्छा गायब,
स्थितप्रज्ञ वो हो जाता है,
153
फल से फर्क पडे ना उसको,
जब जीवन में मिलता है ,
आत्मा इंशा काया में ,
सन्तुष्ट सदा वो रहता है
154------
स्थिर बुद्धि उस मानव में ,
मन में उद्वेग नहीं दुख में,
राग ,भय, क्रोध, रफूचक्कर ,
सर्वदा निस्पृह रहता सुख में ,
155
अनन्त कामना लेके जीता ,
स्नेह रहित मुशि कल से होता ,
फितरत जीवन की ऐसी है ,
पाने को हरदम रोता
156
स्थिर बुद्धि होती उसकी
शुभ अशुभ में फर्क पडे नहीं
विषयों से वो दूर रहे,
आगे इसके तर्क नहीं ,
157
समेटे अपने अंग -2,
सीख उसे कच्छप देता,
इन्द्रियाँ रहे विषयों से दूर,
वो वश में कर लेता ,
158
इन्द्रियों से दूरी कुछ में,
पूर्ण निर्वृत्त ना होती उनमें ,
आसक्ति जीवत रहती ,
प्रवृत्ति नहीं बदलती उनमें ,
159
स्थितप्रज्ञ पुरुष को देखो ,
परम तत्व में आसक्ति है ,
परमपिता से होगा मिलन ,
निर्वृत्त करती आसक्ति है
160
“मन के के हारे हार है ,
“मन के के हारे हार है ,
मन के जीते जीत,” (Taken from outside)
आसक्ति लीन हैं वो ,
विषयों में में रखता प्रीत
168
अन्तःकरण भावना शून्य ,
शान्ति कभी ना मिलती ,
सदा लालसा रहती मन में
सुख की घड़ियां कभी ना चलती ,
169,
जल में चलती नाव ,
पतवारों को रोके वेग,
प्रभाव ऐसा इनिद्रयों का ,
हार लेती ही हैं बुद्धि –वेग
170
स्थिर बुद्धि उसी की है ,
काबिज कभी नहीं होती,
मन को केन्द्रित करें ,
प्रभु भक्ति में ले जाती ,
171
सुख संसारिक पाने की होड़ ,
नाशवान समझते जन ,
दिन रात खुशी में बीते,
यही चाहते जन-मन
172
योगी का ध्यान वहाँ ,
जो परम तत्व का साधन हो ,
सुख है रात्रि समान जिन्है ,
नहीं किसी का बन्धन हो,
173
नदी का मिलन ,
जब सागर से हो जाता है ,
नदी विलीन होगी उसमें,
सागर ना विचलित होता है
174
परमशान्ति आ लिंगन करती,
योग करे ना कोई विकार ,
परमतत्व में विलीन हो तो,
न देती बुद्धि इस को नकार
175
त्याग ,कामना ,तमन्ना रहित ,
ममता ,,अहंकार रहित ,
परम शान्ति आलिं गन करती ,
रहे सर्वदा विकार रहित
176,
ब्रह्म में स्थित पुरुष वही,
योगी कभी ना मोहित होता ,
ब्रह्म स्थिति सदा सामने ,
ब्रह्मानन्द को प्राप्त होता ,
177
ब्रह्मानन्द है परमानन्द ,
आनन्द की असीम सीमा
जीते मरते जाना जिसने ,
मर्म जीवन का समझा उसने
178
जनसामान्य की समझ पहुँच से दूर ,
मूर्ख बनते हंसी का पात्र ,
थोथी बातों में जीते जीवन,
बनता नियम उनका मात्र
179
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ञृणी कृष्णा के जीवन मरते ,
शब्द बने माध्यम हमसे ,
धरा पे भला हो सबका ,
यही प्रार्थना दिल से ,
180
कृपा बर से माधव की ,
सब के काम बने सुबह साम,
हंसी खुशी से गुजरे जिन्दगी
सबको मिले प्रेम- शान्ति का मुकाम
181
द्वितीय अध्याय
गीताबोध
समाप्त
जय हो कृष्णा
----शेष कल
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते है हैं,उनके लिए जरू
री है कि वे कृष्णा धारा से नुड़ेI
री है कि वे कृष्णा धारा से नुड़ेI
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा I

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