मन करता और दिल चाहता ,
प्यार से मसले सुलझाएँ,
परिणाम हाथ से दूर हमारे ,
क्या होगा? हम क्या पाएँ ?I51I
पुत्र प्रेम में डूबे इतने,
धृतराष्ट्र तुम्हारे अपने ,
जिन हाथों ने बचपन सींचा ,
टूट. गये, अब सारे सपने I52I
चिन्तित हैं वे भी ,!
परिणाम अदेंशा ,भय लाता ,
अर्जुन! तेरी ताकत के आगे,
घबराहट से दिल बैठा जाता I53I
पुत्र मोह में इतनी लाचारी,
क्या दुनिया की कमजोरी ?
सभी विरासत चाहते हैं ,
सदा बढ़े ये तेरी मेरी I54I
शकुनि बन के अधर्म ,
घर में चुपके से आया,
सत्य, न्याय की हरेक चाल पे ,
परचम अपना लहराया I55I
सभी जानते ,सभी समझते ,
नुकसान केवल अपना होना,
पता नहीं ,क्या मजबूरी?
सोना अपने हाथ से खोना I56I
व्यक्ति बड़ा न होता है,
खून सभी का लाल.,
सोच हमारी मानसिकता,
अवरूद्ध करे बेडि़यां डाल I57I
जीवन का मानक नहीं कभी ,
हीरे जवाहरात सोना है
मिलते, खोते वक्त बीतता,
क्या इसके लिए रोना है!
I58I
आज जो मेरा है ,
कल तेरा बन जायेगा ,
किस्मत उसकी चलना है
छोड़ साथ वह जायेगा.
I59I
हंसी का पात्र बने हम सब,
समझबूझ सब रखते हैं
श्मशानघाट पे जा के देखो
जीवन का मर्म समझते हैं
I60I
धर्म का मार्ग न्यायकारी
अधर्म वेष बदलता है I
गुमराह करे ये चुपके से,
साथ धर्म के चलता है
I61I
कमजोरी का पुतला इंशा
कमजोरी
गुलाम
बनाती है I
नहीं चाहते करता वो ,
कमजोरी सदा सताती है
I62I
ले के धर्म का नाम,
बढ़ता चलता अधर्म यहाँ ,
लहू का प्यासा जीवों का,
इसको कैसी शर्म यहाँ
I63I
कमजोरी का फायदा ,
ले ता हुआ यहाँ खड़ा,
देख यहाँ मुस्काता,
भाई को भाई से लड़ा
I64Iधर्म
बनेगा कमजोर यहाँ ,
जब होगी धर्म की हानी,
इसकी रक्षा करने की ,
ताकत वीरों से आनी
I65I
जरा चूक हुई, भूलहुई,
अधर्म पैर पसारे,
सदियों तक लड़ना होता
है,
कष्ट उठाते हैं सारे
I66I
सोच समझ की शक्ति पंगु
अर्जुन रहा ढोल का ढोल ,
बार - बार माधव समझाते ,
निकलें बच्चों जैसे बोल
I67I
अर्जुन का भ्रम था , ये
या मोह में भूल गया सब,
घेरे से बाहर सोच न जाये
“ अब, अर्जुन ! जानोगे तुम कब”
I68I
तत्व के मर्म जानो,
चिरस्थायी नहीं होता
करो कल्पना वक्त की
क्या देखा न अपनों को रोता
I69I
वक्त - वक्त की बात है
ये इन्तजार नहीं करता ,
फेरी वाला डेरा है ये ,
त्या ग सभी ये बढ़ता रहता I70I
कितने आये और चले गये,
अब भी जाने को तैयार
क्रम में खड़े सभी है,
बारी का है इन्तजार
I71I
याद रखो अर्जुन तुम,
करू ना करू में समझो फर्क,
निर्णय लेना सीखो तुम,
फालतू के न रखो तर्क
I72I
सीमा पे प्रहरी जगता है
और जन सारे सोते हैं
स्वयं झेलता दिक्कत वो
हंसते -हंसते रहते हैं
I73I
निर्णय में चूक नहीं उन के,
दुश्मन उनसे थर्राता है,
तैयार है हरदम वो
दुश्मन उनसे घबराता है,
I74I
नमन है वीर सपूतों को ,
त्याग सदा है सर्वोपरि.
इनके कारण देश सुरक्षित,
नहीं है कोई इनसे ऊपर,
I75I
धर्म का प्रतीक हो ,तुम पार्थ!,
अधर्म तुम्हें मिटाना है,
फल तेरी इच्छा के बाहर ,
पर इससे तुमको लड़ना है
I76I
जीना है तो ऐसे जियो ,
फक्र करे जमाना तुम पर,
मर भी जायें छोड़ सभी ,
इतिहास बहाये आंसू तुम पर,
I77I
स्वर्ण अक्षर में नाम लिखें ,
गुणंगान करें सारा जमाना,
याद करें और आंसू निकले ,
पार्थ ! ऐसा नाम कमाना
I78I
पापी को हद में रखना,
अर्जुन !कन्धौ पे तेरे भार है,
अधर्म मिटा सका सका ना तू ,
जीना तेरा धिक्कार हैं
I79I
ना कोई तेरा इस जहां में ,
अल्प समय का फेरा है,
अपना कार्य पूर्ण करो तुम ,
ये फेरी वाला डेरा है
I80I
किस कारन ये मोह हुआ ,
समझ से मेरी बाहर है ,
रण क्षेत्र में इसी समय,
श्रेस्थ व्यवहार से बाहर है
I81I
समय का समय पे ध्यान ,
बखां महापुरुष करते है,
धर्म की रक्षा हेतु ,
योद्धा युध क्षेत्र में जाते है
I82I
इसी तरह से सोते रहोगे ,
देश धर्म सब खोते रहोगे ,
डर है तेरी कायरता ,
पार्थ I
कब इसको समझोगे
I83I
त्याग हृदय की दुर्बलता ,
गांडीव उठा !
तू आगे बढ़,
ना मर्दो का व्यवहार ना हो ,
चल युध क्षेत्र में आगे बढ़
I84I
हे माधव ! मन में संताप,
हद से बाहर जाता है,
गुरुदेव ,तात श्री ,पूजनीय,
अटूट मेरा नाता हैI85I
भीख माँगना है मंजूर,
खून हाथ से नहीं सने ,
अपनौ को मौत सुलाकर,
क्यों भोग विलाषी हम बने
I86I
आने वाला पल कैसा होगा,
मुझको ये तो ज्ञात नहीं ,
वे जीतेंगे, हम जीतेंगे,
सुब कुछ है अज्ञात यहीं
I87I
माधव ! मैं हूँ शिष्य आपका,
ज्ञान की भिक्षा दिल से चाहता,
कलयाणकारी जो भी होगा,
मन से उसको करना चाहता
I88I
हरा भरा हो राज्य मेरा,
धनधान्य भरे भाण्डर रहें,
देवो जैसा शासन हो,
अविरल सुख की धारा बहे
I89I
मन की शांति कोसों दूर,
भला क्या मैं लड पायूँगा,
नहीं चाहिए मुझको कुछ,
अपनौ को सब दे जायूँगा
I90I
अर्जुन इतना ना भोला बन ,
सीख जरा विद्वानों से ,
जो चले गये या जाने को हैं ,
शोक दूर रहे विद्वानों से
I91I
सत्य यही है ,अर्जुन
सदा रहा आसितत्व मेरा,
समय बदलता युग बीते ,
बदल सका ना आसितत्व मेरा I92I
मोह शरीर का कभी ना करना,
शरीर बदलते रूप बदलते ,
आत्मा ,अजर ,अमर ,मौजूद सदा ,
जीवन मिलता जब हम मरते
I93I
तू क्या जाने ,तू क्या समझे ,
कितने जीवन तूने जिए ,
राजा हो रंक यहां ,
जीवन भोगे जन्म लिए
I94I
बालपन के सुनहरे पल ,
नींद सुहानी लाये जवानी,
वृद्धावस्था पार किऐ,
मौत लिखती नई कहानी
I95I
सुख दुख इस जहां में ,
विषय संयोग भी रहते हैं ,
सृष्टि से जुड़े विषय विषयानतर,
सहन सभी हम करते हैं
I96I
मोक्ष योग्य वे पुरुष यहां,
समान झ्हें वे जानते ,
परछाई से व्याकुलता न ,
मन से इनको मानते
I97I
अर्जुन !व्याकुल तेरा मन,
व्यथित रही तेरी मानवता ,
सबकुछ अपना दिखता है ,
नहीं किसी से दिल में कटुता
I98I
र्निविकार मेरा जैसा बन जाओ,
जिसमें दुनिया तेरी समाय ,
सशंय को स्थान नही , (सबकुछ जिसमें तेरा हो )
सुख दुख एक समान ही जाय
I99I
दुर्योधन जैसा बन जाओ ,
लड़ता उस को रस मिलता ,
सही गलत को जाने वो ,
पर झूठ गलत में आनन्द मिलता (बरसता)
I100I
शेष कल
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II
(अर्चना व राज)

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