कौन हो तुम ! पार्थ,
क्या कभी स्वयं को समझा,
जीवन मिला है जीने को,
क्या यही अभी तक बूझा
I24I
कर्त्ता नहीं हो जगत के तुम !,
जो चाहो कर सकते,
निमित्त मात्र उस कर्त्ता के,
वो चाहे तब तक हम जीते
I25I
सत्य मार्ग है दुर्गम भारी ,
सत्य विश्व का है आधार ,
सत्य मार्ग पे चलना तुमको ,
यही है जीवन का सार
I26I
लोग करोड़ों मरते प्रतिदिन,
जन्म पुनः वे पाते हैं
हजार साल का इन्तजार,
योद्धा तुम जैसे आते हैं
I27I
धर्म अधर्म का महायुद्ध ,
जीत धर्म की होनी है,
धर्म की रक्षा तुमको करनी ,
लिखा यही, अब होनी है
I28I
- जब-2 अत्याचार बढ़े,
- अधर्म ने जगह बनाई अपनी ,
- दाता भेजा योद्धा तुम जैसे ,
- मिटा अधर्म जगह बना अपनी
- I29I
- माया मोह के इस जगत में,
- ने तेरा कोई, न तुझ से बनता है,
- क्षण भंगुर जीवन में तू,
- क्यों इठलाता फिरता है
- I30I
- आज जो तेरे हैं !
- भ्रम तूने पाल रखा,
- कल को दूर-2 तक,
- ना बनेगा तेरा कोई सखा
- I31I
- वे भी चाहें तब भी,
- कुछ कर नहीं सकते ,
- सदा को इस दुनिया में,
- वे भी जुड़ नहीं सकटे
- I32I
- यही रहस्य इस दुनिया में,
- समझ से बाहर रहता है ,
- तुझको यही समझना होगा,
- जो दाता तुझसे कहता है
- I33I
- कर्म किया किया है जिसने जैसा,
- फल उसका निर्धारित है,
- (बीता हुआ- कल -- कृपया ध्यान दें कर्म के बाद
भाग्य है)
- कल का कर्म आज का भाग्य,
- नियम यही संचालित है
- I34I
- जब-2 धर्म की होगी हानि,
- अधर्म बढ़ाता अत्याचार ,
- तय सीमा से आगे, अर्जुन
- न बढ़ पायेगा अत्याचार
- I35I
इसे थामने की ताकत ,
तुम जैसे योद्धा करते हैं ,
तेरी ताकत के आगे , अर्जुन
नतमस्तक सब होते हैं
I36I
आत्मा ,अजर ,अमर
न कभी ये मरती है,
इसका काम खत्म होता,
नवजीवन धारण करती है
I37I
कर्म करो बस कर्म करो,
फल की इच्छा कभी न करना,
जैसा तेरा कर्म होगा , अर्जुन
अनुरूप उसी के सबकुछ मिलना
I38I
पाक साफ दिल से रहना ,
धर्म की खातिर आगे बढ़ना,
मिटेगा अधर्म ; होगा अर्जुन
प्रकाश पुञ्ज से जगत का खिलना
I39I
कर्म का मिला अधिकार ,(तुझे ) ,
कर्म स्वयं ही करना है,
जैसे तेरे कर्म होगें , अर्जुन
अनुरूप उन्ही के भरना
I40I
देखो भीष्म पितामह को,
वचनबद्धता बनी कमजोरी ,
सिद्धान्त प्रिय हैं व्यक्ति महान,
चली ना इन की सीनाजोरी
I41I
द्रुयों धन जैसा योद्धा बलशाली ,
शातिर दिमाग उसका चलता ,
कटु वचन उनसे कहता ,
नहीं किसी की चलने देता
I42I
अर्जुन सबसे प्रिय हो तुम ,
असहाय हैरान हैं पितामह ,
नहीं चाहते युद्ध वे बिल्कुल,
ये होता बोलो किसकी शह
I43I
शिक्षा जिनसे तुमने पाई ,
प्यार से तुम्हें सिखलाया ,
आज उन्हीं हाथों में देखो,
विरुद्ध तुम्हारे तरकश आया
I44I
भाई ! हां भाई है सारे तेरे अर्जुन ,
खून के प्यासे तेरे हैं ,
नहीं युद्ध धरा पे हो ,
ये न बस में तेरे है
.I45I
परिस्थिति बनी प्रतिकूल ]
सारे योद्धा फेल हुए ]
जो होना है वो होता है
इनमें कभी ना मेल हुए
I46I
Iवही खून इ क परिवार पुराना,
दुनिया जिनसे भय खाती ,
खून बना खून का दुश्मन,
किस्मत इसको सामने लाती
I47I
परिस्थिति बनी प्रतिकूल,
सारे योद्धा !
फ़ेल हुये ,
जो होना हैं वो होता है,
इनमें कभी ना मेल हुये
I48I
सत्य झूठ दो भाई बन के,
मैदान युद्ध के आ डटे ,
इतना ताकतवर ना कोई ,
बिना लड़े ये हटे
I49I
यह भी सच है ,अर्जुन
!,
जीत सत्य की तय है ,
अधर्म कभी ना सिर बोला ,
अल्पकाल इस का भय है
I50(A)
सभी समझते इसको ,
युयुत्सु (war loving)दुर्योधन है मजबूरी,
साथ चाहते हैं सब ,
पर पैदा की इस ने दूरी I50(B)I
शेष कल
निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I
कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना
II
(अर्चना व राज)

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