सोमवार, 11 अप्रैल 2016

031-------आज का गीता बोध पाठ

क्या उसके अपने रण क्षेत्र नहीं आये,
इन्तजार करता युद्ध शुरू होना ,
जीत मिलेगी राज करेगा ,
किस के िलए, क्यों रोना?
 I101I
मानव हो तुम !पार्थ,
सेतु बन के सम्बन्ध निभाते ,
मन का संशय:  युद्ध करो
या भाग क्यों नहीं जाते
 I102I


असत वस्तु की सत्ता ना,
सत का अभाव  नहीं रहता,
ज्ञानवान वे लोग यहाँ ,
मर्म तत्व मन में रहता
I103I

 (आत्मा का वर्णन)

नाश रहित तू उसको जान,
जगत की माया जिनसे है ,
उस अविनाशी की माया है ,
सब कुछ रहता उनसे हैI
104I

नाशवान जगत है मिथ्या ,
आते जाते क्रम चलता,
कौन सदा यहां रहता है ,
सब तो पल -2 मिटता रहता
I105I

अजर, अमर, अविनाशी ,आत्मा ,
भूल करे, जो समझे मरता ,
ना ये मरता, ना ही मारता ,
रूप बदलता, चलता रहताI
106I

अजन्मा ,नित्य,  पुरातन, सनातन,
अदभुत ,अजीब, गजब कहानी ,
मौत रहती कौसों दूर,
रहस्य भरी बस यही कहानी
I107I

वस्त्र पुराना हो जाता,
नये को हम सब धाते हैं,
आत्मा त्यागे. मृत शरीर ,
नवजीवन हम पाते हैंI
108I

पानी पे तलवार चलाना ,
पानी को काट नहीं सके ,
शस्त्रों से ! परे आत्मा ,
आग इसे जला न सकेI
109I

जल की गलन. से दूर ,
वायु सुखा नहीं सकती ,
अच्छेद्य, अदाह्य ,अक्लेद्य ,अशोष्य ,
नित्य अचल स्थिर रहती
I110I

अव्यक्त ,अचिन्त्य, विकार-रहित ,
जीवन इसका सोच से परे ,
शोक के काबिल नहीं आत्मा ,
कहीं. कभी ना ये मरे I
111I

लेती जन्म या मृत्यु प्राप्य,
क्रम इसका चलता रहता,
शोक के योग्य नहीं आत्मा.,
जीवन इसका सदा ही रहता I
112I

 

जन्म मिला है जिसको ,
मृत्यु मिलन होना निशिचत,
मृत्यु मिली है जिसको ,
जीवन मिलना उसका निशिचत I
113I
जन्म से पहले नहीं प्रगट,
मृत्यु अप्रगट कर देती है ,
जीवन रहता प्रगट यहां ,
आश्चर्य दिलों में भर देती हैI
114I
ज्ञानी समझे इस का मर्म ,
अज्ञानी वने हंसी का पात्र ,
आश्चर्य भरा है तत्वों में ,
क्या अर्थ निकालें मात्र?
115I
अवध्य ,आत्मा ,सर्वव्यापी ,
सनातन है प्रवित्त इसकी ,
भय से क्या लेना देना ,
अदभुत ,गजब प्रकृति इस कीI
116I
अर्जुन, क्षत्रिय हो तुम!,
भाग युद्ध से न जाओ',
धिक्कारेगी दुनिया सारी ,
माँ का दूध नहीं लजाओं 
.I117I

धर्मयुद्ध छिड़ा है अब,
भाग्यवान बने हो तु म,
सौभाग्य मिला है तुमको ,
भय से कहाँ जाते हो तु म
I118I

धर्मयुद्ध से मुँह मोड़ना ,
कीर्ति साथ नहीं देगी ,
स्वर्ग का द्वार दूर रहेगा ,
अपकीर्ति सदा तुम्हें मिलेगी
 I119I

सदियों तक अपकीर्ति का भागी,
शर्मनाक है बात यहाँ ,
इससे बेहतर मर जाना,
अप कथन कहेगा सारा जहाँ
 I1120I

सम्मान मिला लोगों से ,
लघुता तेरा हरण करेगी ,
भय के कारन अर्जुन !,
अपकीर्ति तेरा वरण करेगी
 I121I

क्षमता हीन, डरपोक,बुरा ,
अपयश शब्द नहीं रूकेगें ,
इससे बड़ा दुःख क्या ?,
लोगों की नजर में हम गिरेगें
 I122I

मृत्यु वरण कर लेगी,
स्वर्ग में तेरा स्वागत है ,
जीत मिली संग्राम में ,
धरा पे लेा तेरा स्वागत है 
I123I

लाभ ,हानि ,जीवन ,मरण ,
यश, अपयश समान समझ ,
सुख- दुख ,जय -पराजय ,
असमान नहीं इन्हें समझ
I124I

कृष्ण ने कहा अर्जुन से !,
त्यागो भय ,देर ना कर,
महान योद्धा इस धरा का तू ,
तैयार रहो युद्ध कर
I125I
“आज का कर्म भाग्य है कल “

ज्ञान मिला है तुमको ,
जा कर्म में परिवर्तित कर,
 त्याग सभी बन्धन अब,
तैयार रहो युद्ध कर 
I126I
 बुद्धि हीन है पुरुष वे,
 मीठी वाणी से कहते ,
वे क्या रक्षा कर पायगे ,
भोग विलास में डूबे रहते
I127I
 अहंकार का प्रर्दशन ,
ऐश्वर्य ,कामना ,कमजोरी ,
बुद्धिहीन वे कर्महीन ,
जीवन जैसे किताब है कोरी
I128I
अप्राप्ति का प्राप्ति योग ,
प्राप्ति की रक्षा क्षेम कहें
,आसक्ति-हीन ,द्वन्दरहित ,
वेदों की वाणी यही कहें
I129I
योग बने  साध्य तेरा ,
साधन इसके  क्षमा योग्य!
कर्तव्य निभा ,प्रभुता पा ,
उत्तम ,सर्वोत्तम ,योग धारण:योग्य!
I130I
वर्षा होती, जल भरता! ,
पोखर जा सागर से मिले,
बनता ज्ञान का सागर विशाल ,
अथाह ज्ञान की लहर चले
I131I
 तेरा नाता कर्म से है,
फल का मिलना भी तय् हैं,
 जैंसा तेरा कर्म रहेगा ,
अनुरूप उसी के मिलना भी तय् हैं:
 I132I
 फ़ल्  की इच्छा नहीं करो,
 फ़ल् की पहुँच हाथ से दूर,
आज का कर्म भाग्य है कल ,
मिलता सदा ना जाता दूर
I133I
 कर्म करें, सोचें जीत ,
जीत हार का वियोग यहाँ ,
हार सोचते जीत मिले,
हार का हार संयोग यहाँ
I134I


  अर्जुन, उठों धनुष को तान ,
धर्मयुद्ध का रख तू मान ,
 अधर्म का अंश मिटेगा,

 हिम्मत कर ,तू इसको जान 
135 II
कंरु ना कंरू के फेरे में ,
उलझ ना ;तू गिर जायेगा ,
निर्णय तेरा मुशिकल होगा,
 अधर्म धरा  पे रह जायेगा
I136I
सोचो ! देखो! युद्ध यहाँ,
मान सम्मान, जिन्होंने पाया,
कुछ तो अधर्म से जा मिले,
अंधेरा तन मन पे छाया
I137I
सम बुद्धि युक्त पुरूष बनो ,
पाप पुन्य को अब, त्यागो ,अर्जुन !,
समत्व स्वरूप है कर्मकुशलता,
 कर्म बन्धन से जागो ,अर्जुन !
I138I
समबुद्धि वाले पुरूष यहां,
बड़े वें भी ज्ञानी है ,
फ्लेच्छा -विहीन हैं  वे ,
पर हम सब अज्ञानी हैं
I139I

जिस दिन दलदल मोह रूप ,
अर्जुन !तुमने पार किया ,
लोक परलोक के भोगों से ,
समझो अपना उद्धार किया
I140I


वैराग्य मिलेगा, तुम को अर्जुन !,
निर्विकार परम पद को पाओगे ,
जीवन का मर्म मुठ्ठी में ,
तारण स्वयं को कर जाओगे
I141I
 योद्धा का सम्मान दिलों में ,
जो अर्जुन तूने पाया ,
लोग सुनेंगे कायरता,
झूठ कहेंगे तेरी माया 
I142I
नहीं चूकते रहें विरोधी,
मौके की ताक में सदा रहेगें,
निन्दा करते नहीं थकेगें,
वचन कटु  सदा कहेंगे 
I143I
समत्व रहो कर्मों में तुम ,
सिद्धि असिद्धि एक समान ,
आसक्ति को त्यागो ,अर्जुन !,
यहीं छिपा तेरा सम्मानI

144I 

बुद्धि योग का आश्रय लों ,

फल को मुझपे छोड़ो ,

कर्म समझ ,कर्तव्य निभा ,

मोह से तुम नाता तोड़ो I

145I

कुछ तो अज्ञानी यहां ,

असत का राज बढ़ाते हैं ,

आढ़ में  लेते सत तत्व ,

लोगों को मूर्ख बनाते हैंI

146I

सबके अपने-2 कर्म,

सबकी अपनी बानी है ,

फ्लेच्छा में जीवित,

यही बात अज्ञानी है I

 147I

आगे इसके सुनो ,अर्जुन !,

तरह तरह नियम अपवाद सुने,

बुद्धि को भ्रमित करते ,

कुछ स्वयं को तारनहार बने 

I148I

सुन-2 के विचलित बुद्धि ,

कब तक ऐसा सहते रहोगे?,

अचल व स्थिर होगी जब ,

परमतत्व को प्राप्त करोगे I

149
 बुद्धि योग माध्यम तेरा,
 सत सदा करो सहन,
 संयोग तेरा सम्भव है,
 ईश्वर से जब होगा मिलन
150
 भ्रमित हुये अर्जुन ,थोड़ा,
 स्थिर बुद्धि समझ से परे ,
कैसे क्या लक्षण हैं ,
समझाओ इनको माधव मेरे,

151
----शेष कल

                   निपट निरक्षर अज्ञानी है हम ,किससे, क्या लेना, क्या देना I

कृपा बनाये रखना, कृष्णा, शरणागत बस अपनी लेना II

                                                                (अर्चना  राज)
नोट- जो लोग जातिवाद कहते है हैं,उनके लिए जरूरी है कि वे कृष्णा धारा से नुड़ेI
कृष्णा ने मानव कल्याण की ही बात की हैं जातिवाद खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा I



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